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Kabir God went to the satlok sah sashrir

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www.jagatgururampalji.com Pandits had spread the mistaken belief that one who dies in Kashi is liberated and death in Maghar makes one a donkey in next birth. But Kabir Saheb believed that if there is salvation in Kashi then what is the need to chant God's name and meditate throughout the life. Therefore Kabir Saheb reached Maghar from Kashi. Kabir Sahib has also said in his writings loka mati ke bhora re,jo kaashee tan tajai kabeera,tau raamahi kaun nihora re  Kabir God went to Maghar with his physical body to Satlok And in place of his body fragrant flowers were found, which according to the command of God Kabir, the two religions divided into half and took. They built memorial with a difference of 100 feet from each other in Maghar, which is still present today. This is an example of mutual harmony and unity between the two religions Hindus and Muslims. To break the illusion of Hindu religious preachers that the one who dies in Magahar becomes a donkey in nex...
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In 1398, Almighty KavirDev descended in Kashi in physical form and ascended back from Maghar in 1598 along with his body. At this time, he took his his personal servant Dharmadas ji to Satlok, gave information about creation, told about the secret of Kaal (Satan) and got it written in a book.                        www.jagatgururampalji.com

Supach Sudarshan gets Kabir divine

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Supach Sudarshan gets Kabir divine www.jagatgururampalji.com  God Kabir came in the name of Karunamay in Dwapar Yuga. At that time Supach got to Sudarshan, giving him precious knowledge and made him a resident of Satlok.
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                       🌲अपनी भक्ति की मजदूरी (कमाई) कभी व्यर्थ नहीं जाती🌲 द्रोपदी पूर्व जन्म में परमात्मा की परम भक्त थी। फिर वर्तमान जन्म में एक अंधे साधु को साड़ी फाड़कर लंगोट (कोपीन) के लिए कपड़ा दिया था। (अंधे साधु के वेश में स्वयं कबीर परमेश्वर ही लीला कर रहे थे।) जिस कारण से जिस समय दुःशासन ने द्रोपदी को सभा में नंगा करने की कोशिश की तो द्रोपदी ने देखा कि न तो मेरे पाँचों पति (पाँचों पाण्डव) जो भीम जैसे महाबली थे, सहायता कर रहे हैं। न भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य तथा दानी कर्ण ही सहायता कर रहे हैं। सब के सब किसी न किसी बँधन के कारण विवश हैं। तब निर्बन्ध परमात्मा को अपनी रक्षार्थ हृदय से हाथी की तरह तड़फकर पुकार की। उसी समय परमेश्वर जी ने द्रोपदी का चीर अनन्त कर दिया। दुःशासन जैसे योद्धा जिसमें दस हजार हाथियों की शक्ति थी, थककर चूर हो गया। चीर का ढ़ेर लग गया, परंतु द्रोपदी निःवस्त्र नहीं हुई। परमात्मा ने द्रोपदी की लाज रखी। पाण्डवों के गुरू श्री कृष्ण जी थे। जिस कारण से उनका नाम चीर बढ़ाने की लीला में जुड़ा है। इस...
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                            पांच तत्व 25 प्रकृति के नाम          ये वही पांच तत्व है जिससे मानव का शरीर बना है, इसी को पांच तत्व कहा गया है, ( 1.पृथ्वी, 2.जल, 3. अग्नि, 4.वायु, 5. आकाश, ) इन्ही पांचो तत्व के अलग से 5-5 विकृति है, जिन्हें मिलकर 25 विकृति होते है, पृथ्वी तत्व से मांस हड्डी त्वचा रन्ध नाख़ून जल तत्व से लार पसीना खून वीर्य मूत्र अग्नि तत्व से भूख प्यास आलस्य निंद्रा जंभाई वायु तत्व से बोलना सुनना फैलना सिकुड़ना बल लगाना आकाश तत्व से शब्द रस गंध स्पर्श आविर्भाव जिसने इन 25 प्रकृति को समान्य कर लिया वह उन्नति की राह में आगे बढेगा,                           www.jagatgururampalji.com
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                  🌲 अजामेल के उद्धार की कथा 🌲                   अजामेल काशी शहर में रहता था। ब्राह्मण कुल में जन्मा था परंतु शराब पीता था। वैश्या गमन करता था। वैश्या का नाम मैनका था, बहुत सुंदर थी। परिवार तथा समाज के समझाने पर भी अजामेल नहीं माना तो उन दोनों को नगर से निकाल दिया। वे उसी शहर से एक मील (1.7 किमी.) दूर वन में कुटिया बनाकर रहने लगे। दोनों ने विवाह कर लिया। अजामेल स्वयं शराब तैयार करता था। जंगल से जानवर मारकर लाता और मौज-मस्ती करता था। एक दिन नारद जी काशी में आए तथा किसी से पूछा कि मुझे अच्छे भक्त का घर बताओ। मैंने रात्रि में रूकना है। मेरा भजन बने, उसको सेवा का लाभ मिले। उस व्यक्ति को मज़ाक सूझा और कहा कि आप सामने कच्चे रास्ते जंगल की ओर जाओ। वहाँ एक बहुत अच्छा भक्त रहता है। भक्त तो एकान्त में ही रहते हैं ना। लगभग एक मील (आधा कोस) दूर उसकी कुटी है। गर्मी का मौसम था। सूर्य अस्त होने में डेढ़ घंटा शेष था। नारद जी को द्वार पर देखकर मैनका अति प्रसन्न हुई क्योंकि प्रथम बार क...
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                      पूर्ण गुरु की पहचान भारतीय संस्कृति बहुत पुरातन है और इसमें गुरु बनाने की परंपरा भी बहुत पुरानी रही है। प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में एक गुरु अवश्य बनाता है ताकि गुरु उनके जीवन को नई सकारात्मक दिशा दिखा सके। जिस पर चलकर व्यक्ति अपने जीवन को सफल व सुखमय बना सके एवं मोक्ष प्राप्त कर सके। गुरु की महत्ता को बताते हुए परमेश्वर कबीर जी कहते हैं कि कबीर, गुरु बिन माला फेरते, गुरु बिन देते दान। गुरु बिन दोनों निष्फल हैं, पूछो वेद पुराण।। कबीर, राम कृष्ण से कौन बड़ा, उन्हों भी गुरु कीन्ह। तीन लोक के वे धनी, गुरु आगे आधीन। भावार्थ :- कबीर परमेश्वर जी हमें बता रहे हैं कि बिना गुरु के हमें ज्ञान नहीं हो सकता है। गुरु के बिना किया गया नाम जाप, भक्ति व दान- धर्म सभी व्यर्थ है। ■ उपर्युक्त लिखी गई कुछ पंक्तियां एवं दोहों से हमें यह तो समझ में आ गया कि बिना गुरु के ज्ञान एवं मोक्ष संभव नहीं है। वर्तमान में व्यक्ति के सामने सबसे बड़ी समस्या है कि यदि वह गुरु धारण करना चाहे तो वह किसे गुरु बना...