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कुसंगति

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              कुसंगति एक घड़ी की संगत का फल  पद्मपुराण में एक कथा है- एक बार एक शिकारी शिकार करने गया, शिकार नहीं मिला, थकान हुई और एक वृक्ष के नीचे आकर सो गया। पवन का वेग अधिक था, तो वृक्ष की छाया कभी कम-ज्यादा हो रही थी, डालियों के यहाँ-वहाँ हिलने के कारण। वहीं से एक अतिसुन्दर हंस उड़कर जा रहा था, उस हंस ने देखा की वह व्यक्ति बेचारा परेशान हो रहा हैं, धूप उसके मुँह पर आ रही हैं तो ठीक से सो नहीं पा रहा हैं, तो वह हंस पेड़ की डाली पर अपने पंख खोल कर बैठ गया ताकि उसकी छाँव में वह शिकारी आराम से सोयें। जब वह सो रहा था तभी एक कौआ आकर उसी डाली पर बैठा, इधर-उधर देखा और बिना कुछ सोचे-समझे शिकारी के ऊपर अपना मल विसर्जन कर वहाँ से उड़ गया। तभी शिकारी उठ गया और गुस्से से यहाँ-वहाँ देखने लगा और उसकी नज़र हंस पर पड़ी और उसने तुरंत धनुष बाण निकाला और उस हंस को मार दिया। हंस नीचे गिरा और मरते-मरते हंस ने कहा:- मैं तो आपकी सेवा कर रहा था, मैं तो आपको छाँव दे रहा था, आपने मुझे ही मार दिया? इसमें मेरा क्या दोष? उस समय उस पद्मपुराण के शिकारी ने कहा: यद्यपि आपका जन्म उच...

The whole game is of the imagination of the mind

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A woman said to her husband while dying, "I love you very much and do not want to leave you, do not marry again after I leave, if you do this then I will come as a ghost and trouble you"  The young woman died, her husband respected her last wish for 3 months, after the fourth month he met a young woman and fell in love with her and soon the two became engaged. But on the night of the engagement, a ghost appeared and started accusing the man of breach of promise, after that the same routine continued. The ghost would come every night at night and accuse him of disobedience! The ghost was so clever that he could tell every single thing that happened between the man and his wife. When the man got upset with the ghost, someone advised him to go to a Jain guru in the village with a problem.  He went to the shelter of the Jain Guru, the Jain Guru was actually a Psychologist too, he told his whole story to that Jain Guru, then the Jain Guru said, "Okay! So your wife has beco...

गुरु भगवान

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"गुरु दर्श की महिमा" 🌷🙏🌹 सत्संग में समय मिलते ही आने की कोशिश करे तथा सत्संग में नखरे (मान-बड़ाई) करने नहीं आवे। अपितु अपने आपको एक बीमार समझ कर आवे। जैसे बीमार व्यक्ति चाहे कितने ही पैसे वाला हो, चाहे उच्च पदवी वाला हो जब हस्पताल में जाता है तो उस समय उसका उद्देश्य केवल रोग मुक्त होना होता है।  जहाँ डॉक्टर लेटने को कहे लेट जाता है, बैठने को कहे बैठ जाता है, बाहर जाने का निर्देश मिले बाहर चला जाता है। फिर अन्दर आने के लिए आवाज आए चुपके से अन्दर आ जाता है। ठीक इसी प्रकार यदि आप सतसंग में आते हो तो आपको सतसंग में आने का लाभ मिलेगा अन्यथा आपका आना निष्फल है। सतसंग में जहाँ बैठने को मिल जाए वहीं बैठ जाए, जो खाने को मिल जाए उसे परमात्मा कबीर साहिब की रजा से प्रसाद समझ कर खा कर प्रसन्न चित्त रहे। कबीर, संत मिलन कूं चालिए, तज माया अभिमान।  जो-जो कदम आगे रखे, वो ही यज्ञ समान।। कबीर, संत मिलन कूं जाईए, दिन में कई-कई बार।  आसोज के मेह ज्यों, घना करे उपकार।। कबीर, दर्शन साधु का, परमात्मा आवै याद।  लेखे में वोहे घड़ी, बाकी के दिन बाद।। कबीर, दर्शन साधु का, मुख पर बसै सुहाग। ...

गलत को गलत कहने की क्षमता नही तो आपकी प्रतिभा व्यर्थ है

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करनी भुगते आपनी , नाना बिधि की मार ॥ गरीब , चौदा कोटि भयंकरम , चौदा मुनि दिवान । कोटि कोटि ताबै किये , साईं का फुरमान ॥ गरीब , रुधिर भरे जहाँ कुंड हैं , कुंभी जिनका नाम । दवारा हैं मुख लोड का , बड़ा भयंकर धाम ॥ गरीब , सो सो योजन कुंड है , गिरद गता बहु भीर । कोट्यो जिव उसारिये , कहिं न पावै थीर ॥ गरीब , हाथ पैर जिनके नहीं , नहीं शीश मुखद्वार । तलछू माछू होत हैं , परै गैब की मार ॥ गरीब , लघुसी बानी कहत हूँ , दीरघ कही न जाय । जम किंकर की मार से , साईं लेत छुड़ाय ॥ गरीब , नीले जिनके होंठ हैं , काली जिनकी जीभ । चिसमे जिनके लाल है , रक्त टपकै पीव ॥ गरीब , सूर स्वान के मुख बने , धड़ तो जिनकी देह । दस्तो जिनके गुर्ज हैं , मारे निर संदेह ॥ गरीब , स्याम वर्ण शंका नही , दागड दुम खलील । उरध चुंच मुख काग का , चिसमे जिनके नील ॥ गरीब , शक्ति सरुपी तन धरै , लघु दीरघ हो जाहिं । बाहर भीतर मार हैं , तन कूं बहु विधि खाहिं ॥ गरीब , कोटि-कोटि की जोट हैं , कोटि-कोटि एक संग । एका-एकी फिरत है , ऐसेभयंकर अंग ॥ . ॥.....जय हो बंदीछोड़ की.....सत साहेब सभी को.....॥
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गरीब, शीश कट्या मंसूर का, दोनों भुजा समेत। सूली चढ़या पुकारता, कदै न छाड़ो खेत।। गरीब, अनलहक्क कहता चला, मंसूर सूली प्रवेश। जाके ऊपर ऐसी बीती कैसा होगा वो देश।। विचार करने योग्य बात है कि कैसा होगा वह धाम (सतलोक)? जिसे पाने के लिए मंसूर ने शीश और दोनों भुजा के साथ साथ अपना शरीर टुकड़े टुकड़े करवा दिया लेकिन अपना मार्ग नहीं छोड़ा । जब जब किसी महापुरुष ने सत्य बोला है उसे संघर्ष ही झेलना पड़ा है। ऐसे ही अब संत रामपाल जी महाराज उस सतलोक की असली वास्तविकता से जन समाज को परिचित करवा रहे है और उसी के चलते ही उन्हें भी संघर्ष करना पड़ रहा है। लेकिन यह भी सत्य है संतों के काम कभी रुका नहीं करते।

परनारी पैनी छुरी, तीन ठौर से खाय। धन हरे, यौवन हरे, अंत नरक ले जाए।।

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परनारी पैनी छुरी, तीन ठौर से खाय। धन हरे, यौवन हरे, अंत नरक ले जाए।। परनारी पैनी छुरी, तीन ठौर से खाय।   धन हरे, यौवन हरे, अंत नरक ले जाए।। कबीर परमेश्वर ने कहा है :- कि नारियों को भगवान ने सुन्दर और मोहक बनाया है और पुरुषों का काम है कि उनके मोह में उलझे बिना अपना काम करें जिसने भी स्त्रियों के रूप जाल और मोहनी अदाओं पर अपने मन और नैनों को भटकाया उसका नाश तय है। कबीर परमेश्वर ने कहा है :- पर_नारी_पैनी_छुरी__मति_कोई_करो_प्रसंग !    रावण_के_दस_शीश_गये_पर_नारी_के_संग !! इस बात को हर कोई जानता है कि रावण ने पर स्त्री यानी भगवान राम की पत्नी सीता का हरण किया था ! परिणाम आपके सामने है कि रावण ने अपने एक लाख पुत्र व सवा लाख पौत्रों (नाती)के साथ अपने वंश का नाश करवा लिया ! इतिहास और पुराणों में इस तरह की कई कथाएं मौजूद हैं देवी अहिल्या पर कुदृष्टि रखने के कारण देवराज इन्द्र को अपना सिंहासन गवाना पड़ा था। वर्तमान में भी आपने ऐसी कई घटनाएं सुनी होगी की पर स्त्री सम्बंध के कारण कई परिवार तबाह हो गए इसलिए कबीर साहिब जी ने परस्त्रियों को पैनी छुरी कहा है क्योंकि ये कभी रोकर तो कभी हँ...

Kabir is supremegod

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                                EyeWitnessOfGod Complete God KavirDev (Supreme God Kabir), even prior to the knowledge of the Vedas, was present in Satlok, and has also Himself appeared in all the four yugas to impart His real knowledge. In Satyug by the name 'Satsukrit'; in Tretayug by name 'Muninder'; in Dwaparyug by the name 'Karunamay', and in Kalyug, appeared by His real name 'KavirDev' (God Kabir). Apart from this, He appears any time by acquiring different forms and after performing His leela (divine act), disappears. God-loving devout souls are unable to recognise the Supreme God who has appeared at that time to perform a divine act because all the so-called Maharishis and saints have described God as formless. In reality, God is in form. He has a visible human-like body. But God's body is not formed of the union of vessels made up of the five elements. It is made up of one elemen...